94 ग्रंथ
विदु-वाणी
विस्स-धम्मो (विश्व धर्म)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "विस्स-धम्मो" (विश्व धर्म) 165 गाथाओं में निबद्ध है। वस्तु का स्वभाव धर्म है। कार्य में कारण का उपचार कर स्वभाव तक पहुंचाने वाले गुण निमित्तादि भी धर्म हैं। यह ग्रंथ मानवीय गुणों का कथन करने वाला, धर्म की अखंडता, एकता और समन्वयता का परिचायक है।
विस्स-पुज्जो दियंबरो (विश्व पूज्य दिगम्बर)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्राकृत ग्रंथ "विस्स-पुज्जो दियंबरो" (विश्व पूज्य दिगंबर) 165 गाथाओं में निबद्ध है। सर्व पाप-आरंभ त्यागी, सूक्ष्म जंतुओं की भी विराधना से रहित, सर्व भौतिक संसाधनों से विरक्त, तप-त्याग-संयमादर्श, करतल भोजी, तरुतलवासी, आजीवन पदविहारी, असीम दयावान्, वस्त्रादि परिग्रह से रहित दिगंबर मुनि पूजनीय हैं। यह ग्रंथ उनके मार्ग तक पहुंचने का कथंचित् विधान और स्वरूप, चर्या व पूज्यता आदि का वर्णन करने वाला है।
वेरग्ग-सारो (वैराग्य सार)
प्रस्तुत प्राकृत भाषा में रचित ग्रंथ " वेरग्ग- सारो" वैराग्य सार परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित है। यह ग्रंथ 57 गाथाओं में निबद्ध है। संसार- शरीर- भोगों से विरक्ति ही वैराग्य है। वैराग्य तत्वचिंतन को दृढ़ करता है। यह सम्यक् दर्शन, संयम, तप व ध्यानादि को वृद्धिंगत करता है। प्रत्येक मोक्षाभिलाषी को इस ग्रंथ का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।
संजम-सारो (संयमसार)
परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित "संजम- सारो" संयम सार नामक ग्रंथ प्राकृत भाषा में 183 गाथाओं में रचा गया है। प्रस्तुत ग्रंथ में आचार्य महाराज ने संयम की आवश्यकता, दुर्लभता, माहात्म्य के साथ उसके भेद व स्वरूप आदि का सूक्ष्म विवेचन किया है। उपयोग पूर्वक विशुद्ध परिणामों के साथ पढने वाले पाठकों के जीवन में यह ग्रंथ सम्यक चारित्र का दिव्य उजास करने वाला है।
सगसरूवावलोयणं (स्वस्वरूपावलोकन)
सच्चभामा-चरियं (सत्यभामा चरित्र)
सज्जण-वयण-विलासो (सज्जन वचन विलास)
समणभावो (श्रमण भाव)
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुदेव द्वारा रचित 'समण- भावो' नामक ग्रंथ 228 गाथाओं में निबद्ध है। श्रमण अर्थात् मुनियों, दिगम्बर साधुओं के किस समय या परिस्थिति में कैसे भाव होते हैं या होने चाहिए उनका बहुत सुंदरतम वर्णन किया गया है। मन: विशुद्धि के लिए इसे अवश्य पढना चाहिए।
समणायारो (श्रमणाचार)
समवसरण-सोहा (समवशरण शोभा)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "समवसरण सोहा" (समवशरण शोभा) 786 गाथाओं में निबद्ध है। तीर्थंकरों की धर्म सभा तीनों लोकों की श्रेष्ठ धर्म सभा है जिसके लिए संपूर्ण शोभा-सुरम्यता के वर्णन में कथंचित् गणधर भी समर्थ नहीं हैं। समवशरण की रचना तीन लोक की लक्ष्मी का एक स्थान पर एकत्रित होने का भ्रम पैदा करने वाली होती है। यह ग्रंथ वर्तमान कालीन चौबीस तीर्थंकरों की समवशरण भूमि, कोटादि और शिष्यादि का परिमाण एवं उसकी अनुपम शोभा का दिग्दर्शन कराता है।
सम्मत्त-दिवायरो (सम्यक्त्व-दिवाकर)
सम्मत्त-सारो (सम्यक्त्व सार)
सम्मेदसिहर-महप्पुरो (सम्मेद शिखर माहात्म्य)
सामुद्दिग-सत्थं (सामुद्रिक शास्त्र)
सिरि-सीयलणाह-चरियं (श्री शीतलनाथ चरित्र)
प्रस्तुत ग्रन्थ " श्री शीतलनाथ चरित्र" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्राकृत महाकाव्य है। महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने से नैतिक मूल्यों का संवर्द्धन, संस्कारों व सभ्यता का बीजारोपण, हित-अहित परिज्ञान , परिवार, समाज, राष्ट्र व देश के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान, क्षमादि गुणों का विकास होता है। महाकाव्य की विधा में लिखित विभिन्न अलंकार, रस व छंदों से युक्त इस ग्रंथ में दसवें तीर्थंकर श्री शीतलनाथ भगवान् का चरित्र निश्चय ही प्रेरणादायक, दोषहारक व पुण्यकारक है।
सिवमग्गो (शिवमार्ग)
सुद्धप्प-थुदी (शुद्धात्म स्तुति)
सुद्धप्पा (शुद्धात्मा)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा लिखित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "सुद्धप्पा" (शुद्धात्मा) 174 श्लोकों में निबद्ध है। यह एक गूढ़ आध्यात्मिक ग्रंथ है। इसका प्रत्येक कार्य मानों भेदविज्ञान का सूत्र है। आध्यात्मिक सरोवर में अवगाहन करने हेतु इस ग्रंथ को अवश्य पढ़ना चाहिए।
