94 ग्रंथ
अज्ज-सक्किदी (आर्य संस्कृति)
अज्झप्प-सुत्ताणि (अध्यात्म सूत्र)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा 3 अध्याय और 168 सूत्रों में रचित ये प्राकृत ग्रंथ "अज्झप्प-सुत्ताणि" (अध्यात्म सूत्र) विश्व की सर्वोच्च विद्या, आध्यात्मिक विद्या के सूत्रों का प्रतिपादन करने वाली है। ये आध्यात्मिक सूत्र मिथ्यात्व, अज्ञान और असंयम के अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य के समान है। नोट- मन की शांति और तनाव से बचने के लिए इसका अध्ययन अवश्य करें।
अट्ठंग-जोगो (अष्टांग योग)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "अट्ठंग-जोगो" (अष्टांग योग) 273 गाथाओं में निबद्ध है। योग देह और आत्मा दोनों के लिए स्फूर्ति प्रदायक, आरोग्यकारक, दुख-क्लेशनाशक और सुख-शांति वर्धक है। जीव के चरम और परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु यह ग्रंथ श्रेष्ठ रथ के समान है जिस पर आरूढ़ हो संसार की दुर्गम, विलंघ्य खातिकाओं को पार कर मोक्ष महल में प्रवेश पाया जा सकता है।
अणुवेक्खा-सारो (अनुप्रेक्षा सार)
वैराग्य और आत्मिक सौंदर्य की जननी कहलाने वाली इन द्वादश अनुप्रेक्षाओं का अद्भुत निरूपण आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 297 निबद्ध गाथाओं वाले इस "अनुवेक्खा-सारो" (अनुप्रेक्षा सार)नामक ग्रंथ के अंतर्गत किया गया है, जो जीवन की धारा को सम्यक् लक्ष्य की और परिवर्तित करने में समर्थ है।
अप्प-विहवो (आत्म वैभव)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रन्थ अप्प- विहवो (आत्म वैभव) 378 गाथाओं में निबद्ध है। अंतरंग के वैभव का दिग्दर्शन करने वाला यह ग्रंथ मानो आत्म-दर्शन ही हो। आत्मा की विशाल निधि और उसे प्राप्त करने के मार्ग के मानचित्र के समान यह अनुपम ग्रंथ है।
अप्प-सक्खी (आत्म-साक्षी) — आराधना सार की प्राकृत टीका
अप्पणिब्भर-भारदं (आत्मनिर्भर भारत)
देश के सुदृढ़ व विकसित होने के लिए उसकी स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता महत्त्वपूर्ण या प्रथम घटक है। आत्मनिर्भर देश ही दीर्घकाल तक अपने अस्तित्व का संरक्षण करने व विश्व में सुख-शांति की स्थापना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित "अप्पणिब्भर- भारदं"(आत्म निर्भर भारत)नामक इस ग्रंथ में किस प्रकार से देश आत्मनिर्भर हो सकता है, किन कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाये इत्यादि का वर्णन किया गया है।
अप्पसत्ती (आत्म शक्ति)
प्रत्येक आत्मा अनंत शक्ति से युक्त है। आत्मा की शक्ति से अनभिज्ञ जीव पुण्यापुण्यास्रवजायमान शरीर संयोग से नाना योनियों में परिभ्रान्त होकर जन्म-जरा-मृत्यु चंक्रमण रूप किट्ट कालिमा में निग्रहीत होता आ रहा है। इसकी अग्नि विशुद्धि स्वरूपावस्थान है। यह स्वपद जीव निजात्म शक्तियों को जानने पर ही प्राप्त कर सकता है। एतदर्थ आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा यहां आत्मा की लगभग 61शक्तियों का विवेचन किया गया है।
अभयघोस-चरियं (अभयघोष चरित्र)
अम्हाण आयवत्तो (हमारा आर्यावर्त्त)
अवराजिदा (अपराजिता) — रत्नकरंड श्रावकाचार की प्राकृत टीका
यह 'रत्न करण्ड श्रावकाचार' नामक ग्रंथ द्वितीय शताब्दी के आचार्य भगवन् श्री समंतभद्र स्वामी द्वारा रचित है। इसमें श्रावक जीवन का संविधान निहित है। इस ग्रंथ में 'श्रावक धर्म संहिता' नाम से आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुदेव के रत्न करंड श्रावकाचार पर हुए प्रवचनों का संकलन है। आचार्य श्री ने श्रावकों के आचार का बहुत सरल शब्दों में वर्णन किया है। श्रावक के सही स्वरूप को जानने के लिए यह ग्रंथ जिनशासन में प्रसिद्ध है। जैन श्रावक को यह ग्रंथ पढना ही चाहिए।
असोग-रोहिणी-चरियं (अशोक रोहिणी चरित्र) (महाकाव्य)
प्रस्तुत ग्रंथ"असोग-रोहिणी-चरियं" (अशोक रोहिणी चरित्र) नामक महाकाव्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित दिगंबर परम्परा का सबसे वृहद् प्राकृत महाकाव्य है, जो 2442 गाथाओं में निबद्ध व 21 नंदों में विभक्त है। यह महाकाव्य रोहिणी व्रत के माहात्म्य को प्रदर्शित करने वाला है। इसमें अशोक व रोहिणी का अत्यंत प्रेरणादायक चरित्र है। यह ग्रंथ बहुत सरल, रुचिकर व महत्वपूर्ण है। प्रत्येक श्रावक को इस ग्रंथ का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए।
अहिंसगाहारो (अहिंसक आहार)
प्रस्तुत ग्रंथ "अहिंसक आहार" प्राकृत भाषा में रचित परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित लोगों को उनके खान-पान के प्रति जागरूक करने वाली एक अद्वितीय कृति है जो 66 गाथाओं में निबद्ध है। हम सभी जानते हैं कि भोजन का मानव शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भोजन कैसा हो, कैसे ग्रहण करें, मानव जीवन व शरीर पर इसका कैसा प्रभाव पड़ता है इसका वर्णन बहुत ही अच्छे ढंग से इसमें किया गया है। प्रत्येक युवा व बच्चों को यह पुस्तक पढ़नी ही चाहिए।
आयंस-सिक्खाविही (आदर्श शिक्षाविधि)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्राकृत भाषा चक्रवर्ती "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा रचित "आयंस -सिक्खाविही" ( आदर्श शिक्षाविधि) नामक ग्रंथ में शिक्षा की आदर्श पद्धति वर्णित है। जिसमें शिक्षा न केवल धनार्जन का हेतु है अपितु संस्कारों की वर्द्धिका भी है। वह मानव को सदाचार, नैतिक मूल्य वा मानवता का उत्पादन करती है। शिक्षा का प्रारूप, लक्षण, कब व क्या पढायें, कैसे पढायें, विद्यार्थी व शिक्षक का स्वरूप, शिक्षा पद्धति में आवश्यक परिवर्तन, योग, क्रीड़ादि के महत्त्व का वर्णन भी आचार्य भगवन ने प्रस्तुत ग्रंथ में किया है। आज की युवा पीढ़ी भी इस ग्रंथ से जुड़कर संस्कार प्राप्त कर सके अत: इसे इंग्लिश भाषा में रूपांतरित कर इसे जनोपयोगी भी बनाया गया है।
उववासो (उपवास)
परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा रचित "उपवास" नामक प्राकृत भाषा का यह लघु किंतु सारगर्भित ग्रंथ १११ श्लोकों में रचित है। यह कृति उपवास को मात्र आहार त्याग नही बल्कि चित्त- शुद्धि और कर्म निर्जरा का कारण सिद्ध करती है। उपवास के विषय में इतना विस्तृत और सटीक वर्णन करने वाला यह प्रथम ग्रंथ है। सभी जाति, आम्नाय, संप्रदाय के लोगों के लिए यह ग्रंथ समान रूप से उपयोगी है। यह ग्रंथ पाठकों को मानसिक व शारीरिक आरोग्यता प्रदान करने में प्रबल निमित्त है।
कणगकुमार-चरियं (कनककुमार चरित्र)
कम्म-सहावो (कर्म स्वभाव)
आचार्य भगवन् श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा कर्म के मूल भेद, उत्तर भेद और प्रकृति, प्रदेश, स्थिति एवम् अनुभाग इन 4 प्रकार के बंधनों का कथन 597 गाथाओं में निबद्ध इस "कम्म-सहावो" (कर्म स्वभाव) नामक प्राकृत ग्रन्थ में किया गया है।किन कर्मों का बंध किन कारण और प्रत्ययों से होता है इसका कथन इस सिद्धांत ग्रंथ में बहुत ही विशेष रूप से किया गया है जो निश्चय ही भावभीरुता और सम्यक् बोध का कारण है।
कला-विण्णाणं (कला विज्ञान)
मनुष्य में अभिव्यक्ति की अदम्य इच्छा होती है। वह जिन संस्कारों से लालित-पालित होता है उन्हीं को अपने व्यवहार में प्रकट करता है। लेखन, पठन, संगीत, वाणी आदि के माध्यम से उस व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व सहज ही ज्ञात हो जाता है। परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 372 गाथाओं में निबद्ध प्रस्तुत "कला-विण्णाणं" (कला विज्ञान) नामक ग्रंथ में पुरुषों की 72 व स्त्रियों की 64 कलाओं का वर्णन किया गया है। कला से युक्त जीवन स्वपर के लिए वरदान स्वरूप होता है।
को विवेगी (विवेकी कौन)
मनुष्य की शालीनता के तीन उपस्तम्भ हैं - समाज, संस्कृति व सभ्यता। विवेकवान् व्यक्ति ही इन क्षेत्रों में अपने व्यक्तित्व को उद्भासित कर सकता है। विवेकी व्यक्ति ही समाज का प्रिय, यशस्वी और तिलकायित बनता है। आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित यह "को विवेगी" नामक प्राकृत ग्रन्थ संस्कृति, सभ्यता का पोषक व संवाहक है। 84 गाथाओं के माध्यम से विवेकी व्यक्ति के लक्षणों का कथन करने वाला यह अनुपम ग्रंथ है।
खवगराय-सिरोमणी (क्षपकराज शिरोमणि)
प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "खवगराय सिरोमणि" क्षपकराज शिरोमणि परम पूज्य राष्ट्र संत आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज का आदर्श व प्रेरक जीवन चरित्र है। यह जीवन चरित्र उन्हीं के शिष्य परम पूज्य प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा 1317 गाथाओं में लिपिबद्ध है। यह जीवन वृतांत अत्यंत सुरुचिकर वह प्रेरक है। जिनशासन के अत्यंत प्रभावक इन आचार्य का जीवन वृत्त अवश्य ही पठनीय है।
