94 ग्रंथ
जदि-किदि-कम्मं (यति कृतिकर्म)
जिणवयणसारो (जिनवचनसार)
जिणवर-थोत्तं (जिनवर स्तोत्र)
जोदिस-सत्थं (ज्योतिष-शास्त्र)
झाणसारो (ध्यानसार)
प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "झाण - सारो" ध्यान सार परम पूज्य प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा 111 गाथाओं में लिखा गया है। ध्यान के स्वरूप, भेद व उनसे होने वाले लाभ का वर्णन इस ग्रंथ के अंतर्गत किया गया है। ध्यान का प्रतिपादन करने वाला यह अद्भुत ग्रंथ है।
णंदिणंद-सुत्तं (नंदीनंद सूत्र)
णमोथार-महप्पुरो (णमोकार माहात्म्य)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "णमोयार-महप्पुरो" (णमोकार महात्म्य) 159 गाथाओं में निबद्ध है। द्वादशांग के सारभूत जिस मंत्र का एक बार स्मरण जीव को शुभायु, शुभ गति की ओर प्रेरित कर देता है, जिसमें विश्व की समस्त शक्तियों का निवास है, जो असाध्य को साध्य करने की सामर्थ्य से युक्त है, उस महामंत्र की शक्ति, प्रभाव और मंत्र के महात्म्य आदि को दर्शाने वाला यह ग्रंथ अनुपमेय है।
णाण-सारो (ज्ञान सार)
णाणवड्डिणी (ज्ञानवर्द्धिनी)
णीदि-सारो (नीति सार)
तच्चसारो (तत्त्व सार)
परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत "तच्च-सारो"(तत्वसार)ऐसी जीवन रचना दिखलाने वाला मानचित्र है जिसके द्वारा हम स्वयं के आदर्शों को पा सकें, आंतरिक आचार संगठन को सुदृढ़ बना सकें व धर्ममय जीवन व्यतीत करके नैष्कर्म अवस्था को प्राप्त कर सकें।
तच्चसिद्धी (तत्त्वसिद्धि) — तत्त्वार्थ सूत्र की प्राकृत टीका
तित्थयर-णामत्थुदी (तीर्थंकर नाम स्तुति)
जो श्रद्धा और विश्वास के युगल नेत्रों से भगवान् की शरण ग्रहण करता है उसे निश्चय ही परम कृतार्थता प्राप्त होती है। परमात्मा का नाम स्मरण मात्र ही सहस्त्रों पापों का क्षय करने में समर्थ है। वास्तव में जिनस्तुति पुण्य प्रसाधक परिणामों की कामधेनु है। परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ"तित्थयर- णामत्थुदी (तीर्थंकर नाम स्तुति) में तीस चौबीसी अर्थात् 720 जिनेंद्रों की नामस्तुति की गई है। तन्मयतापूर्वक इसका पाठ एक क्षण में भव-भव के वरदान प्राप्ति का कारण हो सकता है।
तियालवत्ती चरियं (त्रिकालवर्ती चरित्र)
दंसण-परिक्खा (दर्शन परीक्षा)
परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा प्राकृत भाषा में रचित "दर्शन-परीक्षा" नामक यह एक अभूतपूर्व ग्रंथ है; जिसमें प्राकृत भाषा की १०४४ गाथाएं हैं। यह ग्रंथ षट्दर्शन का विवेचन करता है। इनके प्रमाण, तत्त्व और मीमांसा का निरूपण करता है और जैन दृष्टि से इन सबका युक्तिसंगत खंडन करता है एवं जैनदर्शन के अनुसार सबकी समीक्षा करता है।
दाण-सारो (दान सार)
परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती ,अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत "दान-सारो" ग्रंथ २२८ गाथाओं में निबद्ध है। इस ग्रंथ के अंतर्गत आचार्यश्री ने दान के स्वरूप, लक्षण, भेद, दाता के गुण, भूषण, दूषण, नवधाभक्ति, शुद्धि इत्यादि के विस्तृत वर्णन द्वारा वर्तमान पीढी को दान की महिमा बताकर उन्हें उनके धर्म में स्थायित्व प्रदान किया है।
धम्म-सुत्ति-संगहो (धर्म सूक्ति संग्रह)
पउमावदी-चरियं (पद्मावती चरित्र)
पण्हबोहो (प्रश्न-बोध)
