403 ग्रंथ
Guruttam bhag-19 (गुरुत्तं भाग-19)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज के प्रवचनों की श्रंखला "गुरुत्तं" नाम से सर्व प्रसिद्ध है। जिसके 18 भाग प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग-19" में "नियमों का महत्व", "जीवन: अवसर या प्रमाद" , "पंचम काल में सत्य का प्रभाव " , "किसका भाग्य सहायक" जैसे शीर्षकों पर आचार्य भगवन के प्रेरणादायक प्रवचन हैं। हमें आशा ही नहीं बल्कि विश्वास है कि इन प्रवचनों का समीचीन रूप से अध्ययन कर आप अपनी विशुद्धि वृद्धिंगत करते हुए जीवन में सम्यक परिवर्तन लाकर स्वात्मोन्नति के साथ परिवार, समाज व देश की उन्नति में भी निमित्त बनेंगे।
Guruttam part- 20 (गुरुत्तं भाग-20)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज के प्रवचनों की श्रंखला "गुरुत्तं" नाम से सर्व प्रसिद्ध है।जिसके 18 भाग प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग- 20" में संकलित प्रवचन जीवन में विविध आयामों का स्पर्श करते हैं। "जीवन प्रबंधन के सूत्र", "गुरु का महत्त्व" , "खर्च कहा और कैसे", "दृढ़ संकल्प की शक्ति", जैन धर्म का प्राण- भावना एवं सहनशक्ति जैसे शीर्षक इस कृति में समाहित हैं, जो व्यक्ति को केवल पढने के लिए ही नहीं बल्कि बार- बार चिंतन मनन के लिए भी बाध्य करते हैं।
Inspirational Tales Part 1 & 2
प्रस्तुत कृति बाल पाठकों को दृष्टि में रखते हुए रची गई है। आधुनिक भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा आज सबसे ज्यादा प्रयोग में आ रही है जिसे देखते हुए बाल-अबाल, देश-विदेश में जिनशासन के संस्कारों को ग्रहण कर सकें इसके लिए यह बेहद आवश्यक कृति है। छोटी-छोटी कथाओं, रोचक चित्र और सरल भाषा में आगम दृष्टातों को लिपिबद्ध किया गया है जो ज्ञानवर्धन होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद भी हैं। नोट-यह कृति पाठशालाओं में भी रुचिपूर्ण तरीके से उपयोगी सिद्ध होगी।
अक्षरातीत
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "क्षरातीत अक्षर" में कुछ तुकोकांत क्षणिकाएं हैं। इन क्षणिकाओं से भी प्रबुद्ध वर्ग लाभान्वित हो सकता है। इन क्षणिकाओं में क्षणिक जीवन की सत्यता का निवास है। ये कृति कविगणों के लिए अति उपयोगी है या जो कवि बनने की भावना रखते हैं उनके लिए अत्यंत सहयोगी कृति है।
अच्छी बातें (भाग 1, 2, 3)
अज्ज-सक्किदी (आर्य संस्कृति)
अज्झप्प-सुत्ताणि (अध्यात्म सूत्र)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा 3 अध्याय और 168 सूत्रों में रचित ये प्राकृत ग्रंथ "अज्झप्प-सुत्ताणि" (अध्यात्म सूत्र) विश्व की सर्वोच्च विद्या, आध्यात्मिक विद्या के सूत्रों का प्रतिपादन करने वाली है। ये आध्यात्मिक सूत्र मिथ्यात्व, अज्ञान और असंयम के अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य के समान है। नोट- मन की शांति और तनाव से बचने के लिए इसका अध्ययन अवश्य करें।
अट्ठंग-जोगो (अष्टांग योग)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "अट्ठंग-जोगो" (अष्टांग योग) 273 गाथाओं में निबद्ध है। योग देह और आत्मा दोनों के लिए स्फूर्ति प्रदायक, आरोग्यकारक, दुख-क्लेशनाशक और सुख-शांति वर्धक है। जीव के चरम और परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु यह ग्रंथ श्रेष्ठ रथ के समान है जिस पर आरूढ़ हो संसार की दुर्गम, विलंघ्य खातिकाओं को पार कर मोक्ष महल में प्रवेश पाया जा सकता है।
अणुवेक्खा-सारो (अनुप्रेक्षा सार)
वैराग्य और आत्मिक सौंदर्य की जननी कहलाने वाली इन द्वादश अनुप्रेक्षाओं का अद्भुत निरूपण आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 297 निबद्ध गाथाओं वाले इस "अनुवेक्खा-सारो" (अनुप्रेक्षा सार)नामक ग्रंथ के अंतर्गत किया गया है, जो जीवन की धारा को सम्यक् लक्ष्य की और परिवर्तित करने में समर्थ है।
अदालत में धर्म
अन्तर्यात्रा
अप्प-विहवो (आत्म वैभव)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रन्थ अप्प- विहवो (आत्म वैभव) 378 गाथाओं में निबद्ध है। अंतरंग के वैभव का दिग्दर्शन करने वाला यह ग्रंथ मानो आत्म-दर्शन ही हो। आत्मा की विशाल निधि और उसे प्राप्त करने के मार्ग के मानचित्र के समान यह अनुपम ग्रंथ है।
अप्प-सक्खी (आत्म-साक्षी) — आराधना सार की प्राकृत टीका
अप्पणिब्भर-भारदं (आत्मनिर्भर भारत)
देश के सुदृढ़ व विकसित होने के लिए उसकी स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता महत्त्वपूर्ण या प्रथम घटक है। आत्मनिर्भर देश ही दीर्घकाल तक अपने अस्तित्व का संरक्षण करने व विश्व में सुख-शांति की स्थापना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित "अप्पणिब्भर- भारदं"(आत्म निर्भर भारत)नामक इस ग्रंथ में किस प्रकार से देश आत्मनिर्भर हो सकता है, किन कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाये इत्यादि का वर्णन किया गया है।
अप्पसत्ती (आत्म शक्ति)
प्रत्येक आत्मा अनंत शक्ति से युक्त है। आत्मा की शक्ति से अनभिज्ञ जीव पुण्यापुण्यास्रवजायमान शरीर संयोग से नाना योनियों में परिभ्रान्त होकर जन्म-जरा-मृत्यु चंक्रमण रूप किट्ट कालिमा में निग्रहीत होता आ रहा है। इसकी अग्नि विशुद्धि स्वरूपावस्थान है। यह स्वपद जीव निजात्म शक्तियों को जानने पर ही प्राप्त कर सकता है। एतदर्थ आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा यहां आत्मा की लगभग 61शक्तियों का विवेचन किया गया है।
अभयघोस-चरियं (अभयघोष चरित्र)
अभिनव सिद्धचक्र मंत्रार्चना
प्रस्तुत कृति "अभिनव सिद्धचक्र मंत्रार्चना " आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित अभिनव सिद्धचक्र महार्चना से संकलित मंत्रावली है। समयाभाव के कारण जो भक्तजन 8 दिन का सिद्धचक्र विधान रचकर अर्चना नहीं कर पाते अथवा जिनका प्रतिदिन सिद्धों की आराधना का नियम है उन श्रद्धालुओं के आग्रह पर इस कृति की रचना हुई। इस कृति के माध्यम से अनेक श्रमण व श्रावकों ने अपने जीवन में 1008 , 500 अथवा 108 विधानों को करने का संकल्प लिया एवं प्रतिदिन विधान के माध्यम से सिद्धों की अर्चना कर पुण्य का संचय कर रहे हैं।
अमरसेन चरित्र (कविवर माणिक्कराज जी)
कविवर माणिक्कराज जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "अमरसेन चरित्र" प्रथमानुयोग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। अमरसेनके साथ साथ वइरसेन का जीवन चरित्र सार रूप से वर्णित किया है। प्रस्तुत कृति में 7 संधियों में 114 कवड़क और 1741 यमक पदों के द्वारा रुचिकर अपभ्रंश भाषा में अनुपम रचना की है।
