403 ग्रंथ
अरिष्ट निवारक त्रय विधान — नवग्रह विधान, वास्तु निवारण, मृत्युंजय (पं. आशाधर जी कृत)
अवराजिदा (अपराजिता) — रत्नकरंड श्रावकाचार की प्राकृत टीका
यह 'रत्न करण्ड श्रावकाचार' नामक ग्रंथ द्वितीय शताब्दी के आचार्य भगवन् श्री समंतभद्र स्वामी द्वारा रचित है। इसमें श्रावक जीवन का संविधान निहित है। इस ग्रंथ में 'श्रावक धर्म संहिता' नाम से आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुदेव के रत्न करंड श्रावकाचार पर हुए प्रवचनों का संकलन है। आचार्य श्री ने श्रावकों के आचार का बहुत सरल शब्दों में वर्णन किया है। श्रावक के सही स्वरूप को जानने के लिए यह ग्रंथ जिनशासन में प्रसिद्ध है। जैन श्रावक को यह ग्रंथ पढना ही चाहिए।
असोग-रोहिणी-चरियं (अशोक रोहिणी चरित्र) (महाकाव्य)
प्रस्तुत ग्रंथ"असोग-रोहिणी-चरियं" (अशोक रोहिणी चरित्र) नामक महाकाव्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित दिगंबर परम्परा का सबसे वृहद् प्राकृत महाकाव्य है, जो 2442 गाथाओं में निबद्ध व 21 नंदों में विभक्त है। यह महाकाव्य रोहिणी व्रत के माहात्म्य को प्रदर्शित करने वाला है। इसमें अशोक व रोहिणी का अत्यंत प्रेरणादायक चरित्र है। यह ग्रंथ बहुत सरल, रुचिकर व महत्वपूर्ण है। प्रत्येक श्रावक को इस ग्रंथ का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए।
अहिंसगाहारो (अहिंसक आहार)
प्रस्तुत ग्रंथ "अहिंसक आहार" प्राकृत भाषा में रचित परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित लोगों को उनके खान-पान के प्रति जागरूक करने वाली एक अद्वितीय कृति है जो 66 गाथाओं में निबद्ध है। हम सभी जानते हैं कि भोजन का मानव शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भोजन कैसा हो, कैसे ग्रहण करें, मानव जीवन व शरीर पर इसका कैसा प्रभाव पड़ता है इसका वर्णन बहुत ही अच्छे ढंग से इसमें किया गया है। प्रत्येक युवा व बच्चों को यह पुस्तक पढ़नी ही चाहिए।
आ जाओ प्रकृति की गोद में
आईना मेरे देश का
आचार्य श्री विद्यानंद जी की यम सल्लेखना (मुनि प्रज्ञानंद)
आज का निर्णय
प्रस्तुत पुस्तक "आज का निर्णय" गुरु मुख से निःसृत सद् विचारों का पुंज है। इसमें 268 सूक्तियां दी गई हैं। परम पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज अमृतमयी सुभाषित रूपी रत्नपिटारा प्रस्तुत कर रहे हैं। ये वर्तमान जीवन को सुखद और सफल बनाने के लिए आचार्य श्री द्वारा दिया गया निर्णय है ,जिस पर अमल करके हृदय को कषायों की कीचड़ से अमल (मल रहित) करके जीवन में सुख शांति आती है।
आधुनिक समस्याएँ प्रामाणिक समाधान
आध्यात्म तरंगिणी (आचार्य सोमदेव सूरी जी)
आयंस-सिक्खाविही (आदर्श शिक्षाविधि)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्राकृत भाषा चक्रवर्ती "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा रचित "आयंस -सिक्खाविही" ( आदर्श शिक्षाविधि) नामक ग्रंथ में शिक्षा की आदर्श पद्धति वर्णित है। जिसमें शिक्षा न केवल धनार्जन का हेतु है अपितु संस्कारों की वर्द्धिका भी है। वह मानव को सदाचार, नैतिक मूल्य वा मानवता का उत्पादन करती है। शिक्षा का प्रारूप, लक्षण, कब व क्या पढायें, कैसे पढायें, विद्यार्थी व शिक्षक का स्वरूप, शिक्षा पद्धति में आवश्यक परिवर्तन, योग, क्रीड़ादि के महत्त्व का वर्णन भी आचार्य भगवन ने प्रस्तुत ग्रंथ में किया है। आज की युवा पीढ़ी भी इस ग्रंथ से जुड़कर संस्कार प्राप्त कर सके अत: इसे इंग्लिश भाषा में रूपांतरित कर इसे जनोपयोगी भी बनाया गया है।
आराधना कथा कोष (ब्र. श्री नेमिदत्त जी) (भाग 1-2-3)
आराधना समुच्चय (श्री रविचन्द्राचार्य)
आराधना सार (श्रीमद्देवसेनाचार्य जी)
आराधना से आराध्य
आहारदान
परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "आहार दान" के माध्यम से दिगंबर संतों की आहार चर्या में श्रावक द्वारा विवेक, मर्यादा, गुणवत्ता को ध्यान रखने हेतु प्रकाश डाला है। आहार दान की विधि क्या है, उसका फल आदि की संपूर्ण जानकारी भी इस पुस्तक से पाठकों को आसानी से सुलभ हो सकती है। पुस्तक के अंत में त्यागी-व्रतियों द्वारा ग्रहण करने योग्य औषधियों, भक्ष्य पदार्थों की मर्यादा, सूतक- पातक की विधि आदि का उल्लेख भी इसमे प्राप्त होता है।
