403 ग्रंथ
प्राकृत वाणी भाग-1-5
प्रस्तुत कृति "प्राकृत वाणी भाग-4" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित तीन प्राकृत ग्रंथों का संग्रह है। जिसमें "पसम भावो", " लोगुत्तर वित्ती" एवं "अशोक रोहिणी चरित्र " नामक ग्रंथ संकलित हैं। प्राकृत वाणी के प्रथम भाग में 12 , द्वितीय भाग में 9 , तृतीय भाग में 7 प्राकृत ग्रंथ संकलित हैं।
बहुत अच्छी बातें (भाग 1, 2, 3)
बूँद भरा सागर
बोधि वृक्ष (प्रश्नोत्तर रत्नमालिका)
प्रस्तुत कृति 'बोधि वृक्ष' अजमेर चातुर्मास 2014 में आचार्य गुरुवर श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा आचार्य भगवन् श्री अमोघवर्ष स्वामी जी द्वारा रचित प्रश्नोत्तर रत्नमालिका पर की गई प्रवचनों की माला है। 21 दिनों की वाचना का प्रस्तुतिकरण इस कृति में किया गया है। अल्पकाय ग्रंथ को प्रवचनों के माध्यम से अल्पमति वालों के लिए भी बहुपयोगी और सरल बना दिया है, जिससे आबाल वृद्ध सभी स्वाध्याय कर सकते हैं।
भक्तामर विधान
भक्तिसागर (चौबीसी चालीसा संग्रह)
भगवती आराधना (आ. श्री शिवकोटी स्वामी जी)
भत्तामर-थोत्तं (भक्तामर स्तोत्र)
भत्तिगुच्छो (भक्ति गुच्छ)
भद्रबाहु चरित्र
भरतेश वैभव (कवि रत्नाकर)
भाव-सारो (भाव सार)
प्रस्तुत ग्रंथ "भाव -सारो" प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री "वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा प्राकृत भाषा में रचित है। इसमें आचार्य भगवन् ने २२८ गाथाओं में भावों का विस्तृत व रोचक वर्णन किया है। यह ग्रंथ पाठकों की विशुद्धि व भाव परिवर्तन में उत्कृष्ट निमित्त है।
भावत्रयफलप्रदर्शी (आ. श्री कुंथुसागर जी)
प्रस्तुत ग्रंथ "भावत्रयफलप्रदर्शी" में विस्तार के साथ अशुभोपयोग से प्राप्त होने वाले विविध प्रकार के दुखों का वर्णन किया है। किस प्रकर का कार्य करने से कौन से कर्म का बंध होता है। वर्तमान काल में प्रत्यक्ष ज्ञानी नहीं हैं किंतु उनकी वाणी हमारे पास है जिसके माध्यम से जाना जा सकता है कि जीव ने पूर्व भव में अच्छे कर्म किए हैं या बुरे कर्म? इसका वर्णन ग्रंथराज में विस्तार के साथ लिखा है। कर्नाटक में जन्मे आचार्य श्री कुंथुसागर जी ने संस्कृत भाषा में विपुल मात्रा में जैन वांग्मय की रचना की है।
मंगल-सुत्तं (मंगल सूत्र)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मंगल-सुत्तं" (मंगल सूत्र) 111 गाथाओं में निबद्ध है। यह ग्रंथ जीवन को मंगल व प्रशस्त करने वाले सूत्रों से युक्त, व्यवहार और निश्चय से युक्त, आध्यात्मिक मंदाकिनी के स्वरूप का परिज्ञान कराने वाला है।
मइथिली-सुत्तं (मैथिली-सूत्र)
मरणकण्डिका (आ. श्री अमितगति स्वामी जी)
मल्लिनाथ पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)
जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ भगवान् के पावन जीवन चरित्र को आचार्य श्री सकलकीर्ति जी मुनिराज ने "श्री मल्लिनाथ पुराण" में 7 परिच्छेदों में निबद्ध किया है। ये ग्रंथ संस्कृत मूल का है किंतु यहां केवल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है जिसमें श्री मल्लिनाथ भगवान् के पूर्व भव में राजा वैश्रवण, तपस्या, संयम, साधना एवम् तीर्थंकर प्रकृति के बंध में कारण भूत षोडशकारण भावना का उल्लेख भी किया है। भगवान् मल्लिनाथ स्वामी के पांचों कल्याणकों का वृहद् वर्णन रोचक, सुगम और बोधप्रद है।
महाणुभावो (महानुभाव)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी ,प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित "महानुभाव" ग्रंथ प्राकृत की १२६ गाथाओं में निबद्ध है। "महानुभाव" एक संबोधन वाक्य है। वर्तमान में बिगड़ती भाषा शैली एवं बढ़ते असंतुलित शब्दों के प्रयोग को देखते हुए आचार्य श्री ने इस ग्रंथ का लेखन किया। 'महानुभाव' इस एक संबोधन शब्द को उपलक्षण मात्र मानकर यहाँ आचार्य श्री के भाव को इस प्रकार ग्रहण करें, कि सदैव अच्छे संबोधन शब्दों का प्रयोग करें। जो स्व-पर विशुद्धि में कारण होगा। सामने वाले के लिए दिया गया अच्छा संबोधन बदले में आपके लिए शुभ भावनाएं व पुण्य फल लेकर आता है।
महापुराण (भाग 1-2)
महावीर पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)
महीपाल चरित्र (कविवर श्री चारित्र भूषण)
प्रस्तुत ग्रंथ में राजा महीपाल को नायक मानते हुए उनके जीवन चरित्र के माध्यम से धर्म की महिमा बतलाई है। कविराज चारित्र भूषण द्वारा रचित ये ग्रंथ सरल और संक्षेप में उपलब्ध है। इस ग्रंथ का स्वाध्याय चारों पुरुषार्थों की प्रेरणा देने वाला है और श्रावकों और श्रमणों के लिए अत्युपयोगी है।
