403 ग्रंथ
पंचरत्न
प्रस्तुत कृति "पंचरत्न" में प्रश्नोत्तर रत्नमालिका, मृत्यु महोत्सव, परमानंद स्तोत्र, ज्ञानसार एवं लघुशांति सुधा सिंधु- इन 5 लघु काय ग्रंथों को संग्रह किया गया है, इससे इसका पंचरत्न नाम सार्थक होता है। अत्यल्प काय ग्रंथ, महा सार गर्भित अर्थ को बताने वाले हैं जिनका अन्वयार्थ और अनुवाद बालकों के लिए भी सहजगम्य है।
पउमावदी-चरियं (पद्मावती चरित्र)
पगवंदन (मुनि शिवानंद प्रशमानंद)
पण्हबोहो (प्रश्न-बोध)
पद्योत्तरी
परिचय के गवाक्ष में (ऐलक विज्ञान सागर)
पागिद-कव्वाली (प्राकृत काव्याली)
पाण्डव पुराण (श्रीमदाचार्य शुभचंद्र देव)
पार्श्वनाथ पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)
पासणाह-चरियं (पार्श्वनाथ चरित्र)
पिच्छि-कमण्डलु (आ. श्री विद्यानंद जी मुनिराज)
पुण्णासव-णिलयो (पुण्यास्रव निलय)
नि:कांक्ष भाव से किया गया पुण्य अरिहंत पद को देने में समर्थ होता है। प्रस्तुत ग्रन्थ "पुण्णासव- णिलयो"(पुण्यास्रव निलय) आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 228 गाथाओं में निबद्ध है। ग्रंथ की प्रत्येक गाथा पुण्य की प्रेरिका है। यह पुण्य की छांव में ले जाने में समर्थ है। पापों से भीति व पुण्य में प्रीति उत्पन्न कराने वाला यह अद्भुत ग्रन्थ है।
पुण्यास्रव कथा कोश भाग-1
श्री रामचंद्र मुमुक्षु द्वारा रचित "पुण्यास्रव कथा कोश भाग -1" ग्रंथ अत्यंत सरल भाषा में रचा गया है जिसमें 6 अधिकारों के माध्यम से पुण्यास्रव के 6 कारणों का ही वर्णन है। 1. जिनेन्द्र पूजन 2. णमोकार महात्म्य 3. स्वाध्याय का फल 4. शीलव्रत का फल 5. उपवास का फल 6. दान का फल - इनकी 57 कथाएं लिपिबद्ध हैं। प्रारंभिक स्वाध्यायार्थी के लिए इस ग्रंथ का मात्र हिंदी अनुवाद ही 2 भागों में प्रकाशित किया गया है।
पुण्यास्रव कथा कोश भाग-2
श्री रामचंद्र मुमुक्षु द्वारा रचित "पुण्यास्रव कथा कोश भाग-2" ग्रंथ अत्यंत सरल भाषा में रचा गया है जिसमें 6 अधिकारों के माध्यम से पुण्यास्रव के 6 कारणों का ही वर्णन है। 1. जिनेन्द्र पूजन 2. णमोकार महात्म्य 3. स्वाध्याय का फल 4. शीलव्रत का फल 5. उपवास का फल 6. दान का फल - इनकी 57 कथाएं लिपिबद्ध हैं। प्रारंभिक स्वाध्यायार्थी के लिए इस ग्रंथ का मात्र हिंदी अनुवाद ही 2 भागों में प्रकाशित किया गया है।
पुण्यास्रव कथा कोष (भाग 1-2) (श्री रामचंद्र मुमुक्षु)
पुराण सार संग्रह (भाग 1-2) (आ. श्री दामनंदी जी)
आचार्य दामनंदि जी द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "पुराण सार संग्रह" अनुपम पठनीय, मननीय, श्रव्य, श्राद्धय, ध्यातव्य व अनुकरणीय है। जो व्यक्ति आदि पुराण, हरिवंश पुराण, पद्म पुराण आदि दीर्घ काय ग्रंथ को देखकर पढ़ने से घबराते हैं, उन महानुभावों के लिए ये कृति अत्यंत उपयोगी है।
पुरुषार्थसिद्ध्युपाय (आ. श्री अमृतचंद्रस्वामी जी)
पूजन व्रत विधि संग्रह
प्रकृति समुत्कीर्तन (सिद्धांत चक्रवर्ती श्री नेमिचंद्राचार्य जी)
प्रभंजन चरित्र (कविवर ब्रह्मराय)
प्रस्तुत ग्रंथ "प्रभंजन चरित्र" में पुण्य पाप के फल का विशद व्यख्यान, पिता पुत्र का स्नेह, पूर्वभव में बांधे गए बैर का प्रतिफल, स्त्री का स्वभाव, अणुव्रत-महाव्रत का महत्व, संसार की दशा इत्यादि विषयों का विस्तार से वर्णन कविवर ब्रह्मराय जी द्वारा किया गया है। देखने में तो बहुत छोटा सा ग्रंथ है किंतु इसमें वर्णित विषय संसार, शरीर-भोगों की यथार्थता का प्रतिबोधक है। वैराग्य की शिक्षा जीवंत उदाहरणों द्वारा दी गई है। नोट-यह ग्रंथ प्राचीन ग्रंथों में से एक है जिन्हें लुप्त होने के भय से पुनः प्रकाशित किया गया है।
