403 ग्रंथ
वसुनंदी प्रश्नोत्तरी (मुनि जिनानंद, ऐ. विज्ञान सागर)
वसुनन्दी उवाच
विघ्नहर विधान (तीस चौबीसी)
विज्जा-वसु-सावयायारो (विद्यावसु श्रावकाचार)
विणयसारो (विनय सार)
प्रस्तुत ग्रंथ "विणय- सारो" विनय सार परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती , अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा 192 अनुष्टुप् छन्दों में प्राकृत भाषा में निबद्ध है। इसमें विनय के लक्षण, भेद आदि बताते हुए विनय के सम्पूर्ण विषय का गहन और सूक्ष्म वर्णन किया गया है।
विदु-वाणी
विद्यानंद उवाच (आ. श्री विद्यानंद जी मुनिराज)
विमलनाथ पुराण (श्री ब्रह्मचारीश्वर कृष्णदास जी)
ब्रह्मचारी कृष्णदास द्वारा रचित प्रस्तुत "विमलनाथ पुराण" 13वें तीर्थंकर श्री विमलनाथ जी के पूर्व भवों से लेकर वर्तमान भव तक वर्णन करते हुए उनके गुणों का गुणगान करता है। प्रस्तुत ग्रंथ को दस अध्यायों के माध्यम से प्रेषित किया गया है जिसमें चित्त को विशुद्ध करने वाली, निर्मल ध्यान को उत्पन्न करने वाली, ज्ञान और संयम-वैराग्य की उत्पत्ति में निमित्त बनने वाले चारित्रिक घटनाओं को सरल व सर्वोपयोगी शैली में वर्णन किया गया है।
विषापहार स्तोत्र (महाकवि धनंजय)
विस्स-धम्मो (विश्व धर्म)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "विस्स-धम्मो" (विश्व धर्म) 165 गाथाओं में निबद्ध है। वस्तु का स्वभाव धर्म है। कार्य में कारण का उपचार कर स्वभाव तक पहुंचाने वाले गुण निमित्तादि भी धर्म हैं। यह ग्रंथ मानवीय गुणों का कथन करने वाला, धर्म की अखंडता, एकता और समन्वयता का परिचायक है।
विस्स-पुज्जो दियंबरो (विश्व पूज्य दिगम्बर)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्राकृत ग्रंथ "विस्स-पुज्जो दियंबरो" (विश्व पूज्य दिगंबर) 165 गाथाओं में निबद्ध है। सर्व पाप-आरंभ त्यागी, सूक्ष्म जंतुओं की भी विराधना से रहित, सर्व भौतिक संसाधनों से विरक्त, तप-त्याग-संयमादर्श, करतल भोजी, तरुतलवासी, आजीवन पदविहारी, असीम दयावान्, वस्त्रादि परिग्रह से रहित दिगंबर मुनि पूजनीय हैं। यह ग्रंथ उनके मार्ग तक पहुंचने का कथंचित् विधान और स्वरूप, चर्या व पूज्यता आदि का वर्णन करने वाला है।
वीर वर्धमान चरित्र
वीरोत्तम भाग 1 एवं 2
वेरग्ग-सारो (वैराग्य सार)
प्रस्तुत प्राकृत भाषा में रचित ग्रंथ " वेरग्ग- सारो" वैराग्य सार परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित है। यह ग्रंथ 57 गाथाओं में निबद्ध है। संसार- शरीर- भोगों से विरक्ति ही वैराग्य है। वैराग्य तत्वचिंतन को दृढ़ करता है। यह सम्यक् दर्शन, संयम, तप व ध्यानादि को वृद्धिंगत करता है। प्रत्येक मोक्षाभिलाषी को इस ग्रंथ का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।
वैविध्य (समाधान)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा लिखित यह कृति "आधुनिक समस्याएं प्रामाणिक समाधान" वर्तमान काल में जिज्ञासु वर्ग हेतु बहुत ही उपयोगी है। इस कृति में आधुनिक समाज में उदीयमान कुछ समस्याओं, जिज्ञासाओं, शंकाओं तथा प्रश्नों एवं आचार्य श्री द्वारा दिए गए सटीक समाधानों को प्रस्तुत किया गया है।
व्रत कथा संग्रह
शांतिनाथ पुराण (भाग 1-2) (कवि असग जी)
प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-1" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है। ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है। कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक संदर्भों का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।
शांतिनाथ पुराण भाग-2
प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-2" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है। ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है। कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक सन्दभोंस का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।
शायद यही सच है
शाश्वत शांतिनाथ ऋद्धि विधान — भक्तामर विधान (आ. मानतुंग स्वामी जी, मूल), शांतिनाथ विधान (पं. ताराचंद्र जी), सम्मेदशिखर विधान (पं. जवाहर दास जी)
शिवपथ का रथ (सामायिक पाठ)
प्रस्तुत कृति "शिवपथ का रथ" में 10 वीं शताब्दी के परम पूज्य आचार्य श्री अमितगति स्वामी द्वारा विरचित द्वात्रिंशतिका अपरनाम सामयिक पाठ के संस्कृत के 32 उपजाति छंदों पर आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा जयपुर चातुर्मास में की गई मार्मिक वाचना को विधिवत् लिपिबद्ध किया गया है। लगभग 36 प्रवचनों में समय का संपूर्ण सार समाहित कर दिया गया है।
