403 ग्रंथ
श्रीनंदा टीका — सिद्धिप्रिय स्तोत्र (संस्कृत)
श्रीपाल चरित्र (आ. श्री सकलकीर्ति जी)
आचार्य सकलकीर्ति जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रीपाल चरित्र" श्रीपाल कामदेव के जीवन चरित्र का प्रत्यक्षवत् वर्णन करने वाला है। इसमें राजा श्रीकंठ के भव से लेकर श्रीपाल के मोक्ष तक का वर्णन अत्यंत सरल भाषा में किया गया है। इसके स्वाध्याय से भवभीरुता, पापों से विरक्ति, संसारिक भोगों के प्रति उदासीनता, शरीर के प्रति निर्ममत्व भाव, संयम की तीव्र पिपासा और आत्म-कल्याण की उत्सुकता प्रकट होती है।
श्रुत निर्झरी
प्रस्तुत कृति "श्रुत निर्झरी" परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज के लोकोपचारी प्रवचनो का संकलन है। ये प्रवचन मानवता के प्रहरी एवं धर्म के प्रेरक निमित्त हैं। सदाचार, सुसंस्कार, शिष्टाचार व सभ्यता की मंगल प्रेरणा देने वाले हैं। प्रस्तुत कृति में "सदाचार की महिमा", "अमावस्या की रात्रि में प्रज्ज्वलित दीप", "कौन धनी त्रिशला के महल का", "घर को स्वर्ग कैसे बनाएं" इत्यादि विषयों पर रेवाड़ी में हुए मीठे प्रवचन श्रृंखला 2014 से संकलित प्रवचन आपके लिए प्रेषित किए गए हैं।
श्रेणिक चरित्र
आचार्य श्री शुभचंद्र स्वामी जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रेणिक चरित्र" के 15 अध्यायों में भगवान महावीर स्वामी की धर्म सभा के प्रमुख श्रोता, भविष्य काल के प्रथम तीर्थंकर राजा श्रेणिक का जीवन चरित्र अत्यंत रोचक व मनोहारी है। ग्रंथकार ने अत्यंत सरल सुबोधक अध्यायों के विभाजन के साथ-साथ छोटी-छोटी घटनाओं को विषयभूत करके भी पाठकों को शास्त्र के सार से जोड़ दिया है। इसमें दृश्य बहुत ही छोटे-छोटे होने से रुचि बनाए रखने में सक्षम हैं जिसे पाठक उपन्यास की तरह पूरा पढ़े बिना विराम नहीं लेंगे।
संजम-सारो (संयमसार)
परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित "संजम- सारो" संयम सार नामक ग्रंथ प्राकृत भाषा में 183 गाथाओं में रचा गया है। प्रस्तुत ग्रंथ में आचार्य महाराज ने संयम की आवश्यकता, दुर्लभता, माहात्म्य के साथ उसके भेद व स्वरूप आदि का सूक्ष्म विवेचन किया है। उपयोग पूर्वक विशुद्ध परिणामों के साथ पढने वाले पाठकों के जीवन में यह ग्रंथ सम्यक चारित्र का दिव्य उजास करने वाला है।
संसार का अंत
संस्कारादित्य
सगसरूवावलोयणं (स्वस्वरूपावलोकन)
सच्चभामा-चरियं (सत्यभामा चरित्र)
सज्जण-वयण-विलासो (सज्जन वचन विलास)
सद्गुरु की सीख
प्रस्तुत कृति "सद्गुरु की सीख" में जन-जन को आह्लादित व नैतिक संस्कार प्रदान करने वाली आबाल वृद्ध सभी को प्ररेणा प्रदान करने वाली कहानियां हैं। संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण और संवर्द्धन में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। कृति को आकर्षक बनाने के लिए चित्रों का सहारा भी लिया है, साथ ही सरल, सहज शब्दों के प्रयोग के कारण यह सभी वर्ग के लिए उपयोगी कृति है। शिक्षाप्रद कथाएं अवश्य पठनीय होती हैं।
सप्तव्यसन चरित्र (आ. श्री सोमकीर्ति भट्टारक)
आचार्य श्री सोमकीर्ति भट्टारक जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "सप्त व्यसन चरित्र" के माध्यम से सप्त व्यसनों के विभिन्न दोषों और उनके त्याग के महत्व का सुंदर विवेचन विभिन्न कहानियों के माध्यम से किया गया है। इस ग्रंथ में सप्त व्यसनों का स्वरूप व कुख्यात अधम पुरुषों का जीवन चरित्र है, भाषा अत्यंत सरल, सहज व रोचक है। बालक से लेकर वृद्ध तक इसे आसानी से पढ़ सकते हैं। लघु काय होते हुए भी यह ग्रंथ अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यसनों में संलिप्त व्यक्तियों के लिए सन्मार्ग दर्शायक प्रकाश किरण के समान है तथा धर्म से पतित व्यक्तियों के लिए बैसाखी के समान है।
सफलता के सूत्र
सबसे अच्छी बातें (भाग 1, 2, 3)
समझाया रविन्दु न माना (सचिन जैन 'निकुंज')
समणभावो (श्रमण भाव)
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुदेव द्वारा रचित 'समण- भावो' नामक ग्रंथ 228 गाथाओं में निबद्ध है। श्रमण अर्थात् मुनियों, दिगम्बर साधुओं के किस समय या परिस्थिति में कैसे भाव होते हैं या होने चाहिए उनका बहुत सुंदरतम वर्णन किया गया है। मन: विशुद्धि के लिए इसे अवश्य पढना चाहिए।
समणायारो (श्रमणाचार)
समवशरण विधान
समवसरण-सोहा (समवशरण शोभा)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "समवसरण सोहा" (समवशरण शोभा) 786 गाथाओं में निबद्ध है। तीर्थंकरों की धर्म सभा तीनों लोकों की श्रेष्ठ धर्म सभा है जिसके लिए संपूर्ण शोभा-सुरम्यता के वर्णन में कथंचित् गणधर भी समर्थ नहीं हैं। समवशरण की रचना तीन लोक की लक्ष्मी का एक स्थान पर एकत्रित होने का भ्रम पैदा करने वाली होती है। यह ग्रंथ वर्तमान कालीन चौबीस तीर्थंकरों की समवशरण भूमि, कोटादि और शिष्यादि का परिमाण एवं उसकी अनुपम शोभा का दिग्दर्शन कराता है।
समाधि तंत्र (आ. श्री पूज्यपाद स्वामी जी)
समाधि सार (आ. श्री सोमदेव स्वामी जी)
श्री सोमसेनाचार्य कृत "समाधि सार" नामक ग्रंथ में 200 श्लोक निबद्ध हैं।यह ग्रंथ वस्तुत: समाधि साधना हेतु सारभूत ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया है। ग्रंथ सरल, सुबोध और सारगर्भित है। समाधि की साधना प्रत्येक भव्य का परम और चरम लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने में यह ग्रंथ सहायक है।
