403 ग्रंथ
गुरुत्तं भाग- 9
प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग -9" में परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज के मुखारविंद से नि:सृत तीर्थंकर प्रकृति की कारणभूत सोलहकारण भावना के आगमोक्त अद्भुत चिंतन को शब्दों के आभूषणों से विभूषित किया गया है। इसके 18 प्रवचनों में भाषा अत्यंत सरल, सुबोधपूर्ण एवं प्रांजुल है जो कि प्रत्येक पाठक के लिए सहज ही हृदयंगम करने योग्य है।
गुरुत्तं भाग-1
प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग-1" में परम पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज के मंगलमय, हितकारी प्रवचनों का संकलन है। इसके अंतर्गत "पुण्य के साथी, दुष्ट संग से करो किनारा, भ्रष्टाचार क्यों, ज्ञान के शत्रु, गांठ खोल देखी नहीं, चित्त शुद्धि इत्यादि चित्त को निर्मल करने वाले सार गर्भित, सैद्धांतिक विषयों का अनुपम विवेचन है। ज्ञान के पिपासु इस पुस्तक का अध्ययन सहज भाव से करें।
गुरुत्तं भाग-2
प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग-2" में परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज के हृदय में विद्यामन ज्ञान के विशाल समुद्र की अनुपम अमृत धारा है जिसमें कि "भाग्य और पुरुषार्थ, सबसे बड़ा दुःख, सन्मार्ग दर्शक गुरु, सपना या अपना, समर्पण, कारागृह नहीं सुधारगृह इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों पर वृहद व्याख्या को परिलक्षित किया गया है। जनमानस भी इस पुस्तक का गुणग्राही दृष्टि से अध्ययन कर सन्मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
गुरुत्तं भाग-3
प्रस्तुत कृति "गुरुत्तं भाग-3" में परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज के मुखारविंद से नि:सृत ज्ञानामृत की बूंदों का अनोखा संग्रह है जो कि जयपुर चातुर्मास-2015 में हुई मीठे प्रवचन श्रंखला के प्रवचनों का सुंदरतम उपहार है। इसमें "अब तो छोड़ो चमडे का व्यापार, बचपन की संजीवनी, जीवन की अंतरधारा, झूर्रियों की यथार्थता" इत्यादि जनहितकारी, मर्मभेदी उपदेशों का कोष है।
गुरुवर तेरा साथ
आचार्य भगवन् श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "गुरुवर तेरा साथ" में छोटे-छोटे 365 सूत्र हैं जिसमें से प्रत्येक दिन एक-एक सूत्र अपने हित के लिए चिंतन में ला सकते हैं। ये ऐसे सूत्र हैं जिन्हे पानी की तरह पीना नहीं मिश्री की तरह चबाना जरूरी है। यह ऐसी पगडंडियाँ हैं जो हमें सिद्धालय तक पहुंचाने वाली हैं।
गौतम स्वामी चारित्र (मण्डलाचार्य श्री धर्मचंद्र जी)
मंडलाचार्य श्री धर्मचंद्र स्वामी जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "गौतम स्वामी चरित्र" भगवान महावीर स्वामी के मुख्य गणधर गौतम स्वामी के जीवन चरित्र पर आधारित है, जो उनके भूत-भविष्यत्-वर्तमान भवों को दर्शाता है। इसमे स्वर्ग, नरक और मध्यलोक की स्थिति, देव, तिर्यंच और मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति आदि का वर्णन श्रेष्ठतम रीति से किया गया है। इस ग्रंथ के स्वाध्याय से पाप भीरूता, सम्यक्त्व और चारित्र में दृढ़ता तथा निर्मलता आती है। यह महानता के संस्कारों का बीजरोपण करने का सर्वोत्तम उपाय है।
चंद्रप्रभ चरित्र
चार श्रावकाचार संग्रह
प्रस्तुत कृति "चार श्रावकाचार" के नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसमें 4 श्रावकाचारों को सम्मिलित किया गया है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार, चारित्रसार गत श्रावकाचार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा गत श्रावकाचार और वसुनन्दी श्रावकाचार। इन 4 श्रावकाचारों का भव्य प्राणियों को निश्चित ही स्वाध्याय करना चाहिए एवं श्रावकपने को अंगीकार करने हेतु स्वीकार करना चाहिए। ये कृति श्रावकों के लिए बहुपयोगी लघु काय में प्रस्तुत की है।
चारित्र शुद्धि विधान
चारूदत्त चरित्र (ब्र. श्री नेमिदत्त जी)
ब्रह्मचारी नेमीदत्त द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ चारुदत्त चरित्र सरल हिंदी में रचित है जिसमें चारुदत्त नामक पात्र के उत्तम जीवन पर प्रकाश डाला है। मुख्य घटना इसमें चारुदत्त द्वारा बकरे को णमोकार मंत्र सुनाए जाने की है तथा इन दोनों की भूत-भविष्यत्-वर्तमान जीवन का वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ के माध्यम से अंतरंग में विद्यमान मिथ्यात्वादि अंधकार तिरोहित हो जाता है, जीवन में समता का भाव, संतोष वृत्ति एवं दुर्व्यसनों से मुक्त होने की अपूर्व ही प्रेरणा प्राप्त होती है।
चित्रसेन पद्मावती चरित्र (पं. पूर्णमल्ल जी)
प्रस्तुत ग्रंथ में भगवान महावीर स्वामी के समय में हुए चित्रसेन और पद्मावती के शील व्रत का वर्णन किया गया है। पंडित पूर्णमल्ल जी द्वारा ग्रंथ का सरल भाषा में कथन करते हुए रचना की गई है। इस पौराणिक कथा में आहार दान की अनुमोदना करने मात्र से ही हंस युगल चित्रसेन और पद्मावती हुए।
चूको मत
चेलना चारित्र
चैन की जिंदगी
चौंसठ ऋद्धि विधान
